TIME PASS

Entertenment & Knowledge & Time Pass.NEWS

Friday, March 16, 2018

दुर्गा- महिला सशक्तिकरण का अनुयायी

No comments :
   Durga Maa Live Wallpaper- screenshot                                         

दुर्गा ताकत के लिए एक नाम है वह प्यार है। वह सुंदरता का एक प्रतीक है वह प्यार, देखभाल और स्नेही है

वह विचारों और कार्यों की देवी है जो सब कुछ एक साथ जोड़ती है। वह अंतिम शक्ति है

बुद्धिमान मां दुर्गा की तरह, महिला का भी कई चेहरे और व्यक्तित्व का रंग है। एक महिला एक वित्तीय सलाहकार और घरेलू निर्माता के रूप में काम करती है वह आत्मविश्वास से बाहर की दुनिया में कदम रखती है और उसका निशान बनाती है और उसकी उपस्थिति महसूस करती है।

घर के सामने वह गृह मंत्री हैं। वह भविष्य की पीढ़ियों का पोषण करती है

यह उसके प्रयासों के साथ है कि एक घर एक गृह बन जाता है वह अपने घर का 'दिल' है

वह सभी सदस्यों के लिए एक मार्गदर्शक बल की तरह काम करती है।

वह खुद कई बार दुखी हो सकती है लेकिन हर कोई उसे खुश रखने के लिए हर जगह रखेगा। वह खुद दर्द में पड़ सकती है लेकिन अपने प्रियजनों को खुशी देने के लिए तैयार हो सकती है।

सभी परिस्थितियों में, वह अपनी सारी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए तैयार रहती है क्योंकि वह ईमानदारी से उन्हें खुश करने का अनुभव करती है।

एक महिला अपने चारों ओर हर किसी के लिए विशेष रूप से बच्चों को विभिन्न मूल्यों को पोषित करती है, पोषण देती है,

जब उसकी मदद की आवश्यकता होती है, वह प्यार से समर्थन करती है और हर किसी की सहायता करती है

भावनात्मक संकट के समय, वह एक सच्चे समर्थन प्रणाली की तरह काम करती है।

वह एक मजबूत अध्यक्षता व्यक्तित्व है

  Durga Maa Live Wallpaper- screenshot thumbnail
एक व्यक्ति जो स्नेह और ताकत की खूबसूरती को एक साथ रखता है।
वह वास्तव में परिवार और समाज में एक बेहतर स्थिति के हकदार हैं। एक महिला होने के लिए उसे सम्मान करना होगा

वह हमारी बेटी, बहन, मां, मित्र पत्नी या हमारा कोई अन्य सुंदर रिश्ता हो सकता है

लेकिन, अगर हम गहराई से सोचते हैं कि वह हमारे अस्तित्व और जीवन में मौजूदगी का अंतिम कारण है।

इसलिए, इस नवरात्र पर हम सभी महिलाओं को हमारे जीवन में धन्यवाद देते हैं जिन्होंने हमारे जीवन में अंतर बना दिया है। हमारे जीवन में शारीरिक रूप से वर्तमान दुर्गा माँ

महिला शक्ति के लिए 

शक्ति की शक्ति के लिए 

Ring tone

No comments :
https://youtu.be/8z29FFr7tN0

नवदुर्गा :स्वरुप देवी माँ के नौ !!9 ROOP of Maa Durga, Nav Durga, Navratri..

No comments :

Nav Durga, नवरात्रि के नौं दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों यानि की नवदुर्गा की पूजा-अर्चना, आराधना व उपासना की जाती है और प्रत्‍येक दिन मां दुर्गा के एक अलग रूप की उपासना का प्रावधान है। नवरात्र का अर्थ शिव और शक्ति के उस नौ स्वरूप से भी है , जिन्होंने आदिकाल से ही इस संसार को जीवन प्रदायिनी ऊर्जा प्रदान की है और प्रकृति तथा सृष्टि के निर्माण में मातृशक्ति और स्त्री शक्ति की प्रधानता को सिद्ध किया है। जिस प्रकार सृष्टि या संसार का सृजन ब्रह्मांड के गहन अंधकार के गर्भ से नवग्रहों के रूप में हुआ , उसी प्रकार मनुष्य जीवन का सृजन भी माता के गर्भ में ही नौ महीने के अन्तराल में होता है। मानव योनि के लिए गर्भ के यह नौ महीने नव रात्रों के समान होते हैं , जिसमें आत्मा मानव शरीर 

9 ROOP of Maa Durga, Nav Durga, Navratri


देवी दुर्गा के नव दुर्गाओं के स्वरूप की चर्चा महर्षि मार्कण्डेय को ब्रह्मा जी द्वारा इस क्रम के अनुसार संबोधित किया है।                                                                                            Nav Durga, The nine forms of Goddess Durga.. Maa Shailputri, Maa Brahmacharini, Maa Chandraghanta, Maa Kushmanda, Maa Katyayani...
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पंचमं स्क्न्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः !!

प्रथम माँ शैलपुत्री :

Nav Durga, देवी दुर्गा के नौ रूपो में पहले स्वरूप में ‘शैलपुत्री’ का स्थान आता हैं । शैल का अर्थ शिखर होता हैं | शैलराज हिमालय की कन्या ( पुत्री ) होने के कारण माँ दुर्गा का यह स्वरूप ‘शैलपुत्री’ कहलाया है। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम हैं । पौराणिक कथाओं के अनुसार मां शैलपुत्री अपने पूर्वजन्म में दक्ष-प्रजापति की पुत्री सती थीं, जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था । शास्‍त्रों के अनुसार माता शैलपुत्री का स्वरुप अति दिव्य है। मां के दाहिने हाथ में भगवान शिव द्वारा दिया गया त्रिशूल है जबकि मां के बाएं हाथ में भगवान विष्‍णु द्वारा प्रदत्‍त कमल का फूल सुशोभित है। मां शैलपुत्री बैल पर सवारी करती हैं और इन्‍हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है। माँ शैलपुत्री की अराधना करने से आकस्मिक आपदाओं से मुक्ति मिलती है तथा मां की प्रतिमा स्थापित होने के बाद उस स्थान पर आपदा, रोग, व्‍याधि, संक्रमण का खतरा नहीं होता तथा जीव निश्चिंत होकर उस स्‍थान पर अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं । शैलपुत्री के रूप की उपासना करते समय निम्‍न मंत्र का उच्‍चारण करने से मां जल्‍दी प्रसन्‍न होती हैं, तथा वांछित फल प्रदान करने में सहायता करती हैं-
मंत्र:- वन्देवांछितलाभायचंद्राद्र्धकृतशेखराम। वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम।।
यह भी पढ़े

द्वितीय माँ ब्रह्मचारिणी :

Nav Durga, के दूसरे स्वरूप के रूप में माँ ब्रह्मचारिणी का स्थान दिया गया हैं , नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली।
भारतीय संस्‍कृति की हिन्‍दु मान्‍यता के अनुसार मां दुर्गा का ब्रह्मचारिणी रूप, हिमालय और मैना की पुत्री हैं, जिन्‍होंने भगवान नारद के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठिन तपस्‍या की, जिससे खुश होकर ब्रम्‍हाजी ने इन्‍हे मनोवांछित वरदान दिया जिसके प्रभाव से ये भगवान शिव की पत्‍नी बनीं।
ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है। मां के दाहिने हाथ में जप की माला है और बायें हाथ में कमण्डल है तथा मान्‍यता ये है कि माता ब्रह्मचारिणी की पूजा और साधना करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है।
मंत्र:- या देवी सर्वभूतेषु ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता | नमस्तसयै, नमस्तसयै, नमस्तसयै नमो नम: |

तृतीय माँ चन्द्रघंटा :

Nav Durga, नवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा की जिस तीसरी शक्ति पूजा-अर्चना की जाती है, उन दिव्य रुपधारी माता चंद्रघंटा की दस भुजाएं हैं। मां के इन दस हाथों में ढाल, तलवार, खड्ग, त्रिशूल, धनुष, चक्र, पाश, गदा और बाणों से भरा तरकश है। मां चन्द्रघण्टा का मुखमण्डल शांत, सात्विक, सौम्य किंतु सूर्य के समान तेज वाला है। इनके मस्तक पर घण्टे के आकार का आधा चन्द्रमा भी सुशोभित है।देवी स्वरूप चंद्रघंटा बाघ की सवारी करती है। इसके दस हाथों में कमल , धनुष-बाण , कमंडल , तलवार , त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र हैं। इसके कंठ में सफेद पुष्प की माला और रत्नजड़ित मुकुट शीर्ष पर विराजमान है। अपने दोनों हाथों से यह साधकों को चिरायु आरोग्य और सुख सम्पदा का वरदान देती है।
जब महिषासुर के साथ माता दुर्गा का युद्ध हो रहा था, तब माता ने घंटे की टंकार से असुरों का नाश कर दिया था। इसलिए नवरात्रि के तृतीय दिन माता के इस चंद्रघण्‍टा रूप का पूजन किया जाता है।
मां चंद्रघंटा नाद की देवी हैं, इसलिए इनकी कृपा से साधक स्वर विज्ञान यानी गायन में प्रवीण होता है तथा मां चंद्रघंटा की जिस पर कृपा होती है, उसका स्वर काफी मधुर होता है
मां चंद्रघंटा की उपासना करने के लिए मंत्र निम्‍नानुसार है:
मंत्र:- पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते महयं चन्दघण्टेति विश्रुता।।

चतुर्थ माँ कूष्मांडा :

Nav Durga, नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। मान्‍यता ये है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब कुष्माण्डा देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अपनी मंद-मंद मुस्कान भर से ब्रम्हांड की उत्पत्ति करने के कारण ही इन्हें कुष्माण्डा के नाम से जाना जाता है इसलिए ये सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं।
मां कुष्‍माण्‍डा की आठ भुजाएं हैं। इसलिए मां कुष्मांडा को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। मां सिंह के वाहन पर सवार रहती हैं। देवी कुष्मांडा का निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है जहां निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है।
इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। आज के दिन साधक का मन ‘अनाहत’ चक्र में अवस्थित होता है। मां कुष्‍माण्‍डा की उपासना करने के लिए निम्‍न मंत्र की साधना करना चाहिए:
मंत्र:-या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

पंचम माँ स्कन्दमाता :

नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। देवी स्कन्द माता ही हिमालय की पुत्री पार्वती हैं, जिन्‍हें माहेश्वरी और गौरी के नाम से भी जाना जाता है। ये पर्वत राज की पुत्री होने की वजह से पार्वती कहलाती हैं, महादेव की वामिनी यानी पत्नी होने से माहेश्वरी कहलाती हैं और अपने गौर वर्ण के कारण देवी गौरी के नाम से पूजी जाती हैं। गोद में स्कन्द यानी कार्तिकेय स्वामी को लेकर विराजित माता का यह स्वरुप जीवन में प्रेम, स्नेह, संवेदना को बनाए रखने की प्रेरणा देता है। भगवान स्कंद ‘कुमार कार्तिकेय’ नाम से भी जाने जाते हैं। पुराणों में स्कंद को कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है।
देवी स्कन्दमाता की चार भुजाएं हैं जहां माता अपने दो हाथों में कमल का फूल धारण करती हैं और एक भुजा में भगवान स्कन्द या कुमार कार्तिकेय को सहारा देकर अपनी गोद में लिये बैठी हैं जबकि मां का चौथा हाथ भक्तो को आशीर्वाद देने की मुद्रा मे होता है । मां स्‍कंदमाता की उपासना करने के लिए निम्‍न मंत्र की साधना करना चाहिए:
मंत्र:- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्‍कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

षष्टम माँ कात्यायनी :

Nav Durga, माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। नवरात्र के छठवें दिन मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है जहां कात्यायन ऋषि के यहां जन्म लेने के कारण माता के इस स्वरुप का नाम कात्यायनी पड़ा । मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भव्य है। इनकी चार भुजाएँ हैं। मां कात्यायनी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है।
मां कात्यायनी शत्रुहंता है इसलिए इनकी पूजा करने से शत्रु पराजित होते हैं और जीवन सुखमय बनता है। जबकि मां कात्यायनी की पूजा करने से कुंवारी कन्याओं का विवाह होता है। भगवान कृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने कालिन्दी यानि यमुना के तट पर मां कात्‍यायनी की ही आराधना की थी। इसलिए मां कात्यायनी ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में भी जानी जाती है। मां दुर्गा के कात्‍यायनी रूप की उपासना करने के लिए निम्‍न मंत्र की साधना करना चाहिए:
मंत्र:- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्‍यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

सप्तम माँ कालरात्रि :

Nav Durga, कालरात्रि देवी माँ के सबसे क्रूर,सबसे भयंकर रूप का नाम है| दुर्गा का यह रूप ही प्रकृति के प्रकोप का कारण है| माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम ‘शुभंकारी’ भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है।
इनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। ये तीनों नेत्र ब्रह्मांड के सदृश गोल हैं। इनसे विद्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं।
माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है। मां दुर्गा के कालरात्रि रूप की उपासना करने के लिए निम्‍न मंत्र की साधना करना चाहिए:
मंत्र:- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अष्टम माँ महागौरी :

Nav Durga, माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। आठ वर्ष की आयु में उत्पत्ति होने के कारण नवरात्र के आठवें दिन महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है । अपने भक्तों के लिए यह अन्नपूर्णा स्वरूप है। इसीलिए इनके भक्त अष्टमी के दिन कन्याओं का पूजन और सम्मान करते हुए महागौरी की कृपा प्राप्त करते हैं। यह धन-वैभव और सुख-शान्ति की अधिष्ठात्री देवी है। सांसारिक रूप में इनका स्वरूप बहुत ही उज्जवल , कोमल , सफेदवर्ण तथा सफेद वस्त्रधारी चतुर्भुज युक्त एक हाथ में त्रिशूल , दूसरे हाथ में डमरू लिए हुए गायन संगीत की प्रिय देवी है , जो सफेद वृषभ यानि बैल पर सवार है।
मां महागौरी की उत्‍पत्ति के संदर्भ में कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं जिससे देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं जिसकी वजह से इनका नाम गौरी पड़ा।
नवरात्रि के अष्‍ठमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। मां दुर्गा के महागौरी रूप की उपासना करने के लिए शास्‍त्रों में निम्‍न मंत्र की साधना का वर्णन है:
मंत्र:- सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते”।।

नवम माँ सिद्धिदात्री :

Nav Durga, नवरात्र-पूजन के नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है। मां सिद्धिदात्री भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करती है। देवी दुर्गा के इस अंतिम स्वरुप को नव दुर्गाओं में सबसे श्रेष्ठ और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। जो श्वेत वस्त्रों में महाज्ञान और मधुर स्वर से भक्तों को सम्मोहित करती है। यह देवी भगवान विष्णु की अर्धांगिनी हैं और नवरात्रों की अधिष्ठात्री हैं। इसलिए मां सिद्धिदात्री को ही जगत को संचालित करने वाली देवी कहा गया है।
माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं और माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था और इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में ‘अर्द्धनारीश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हुए।
नवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा उपासना करने के लिए नवाहन का प्रसाद और नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल-फूल आदि का अर्पण करके जो भक्त नवरात्र का समापन करते हैं , उनको इस संसार में धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप है , जो सफेद वस्त्रालंकार से युक्त महा ज्ञान और मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती है। नवें दिन सभी नवदुर्गाओं के सांसारिक स्वरूप को विसर्जन की परम्परा भी गंगा , नर्मदा , कावेरी या समुद्र जल में विसर्जित करने की परम्परा भी है। नवदुर्गा के स्वरूप में साक्षात पार्वती और भगवती विघ्नविनाशक गणपति को भी सम्मानित किया जाता है।
मंत्र:- या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता | नमस्तसयै, नमस्तसयै, नमस्तसयै नमो नम: |

चैत्र नवरात्रि पूजाविधि, शुभ मुहूर्त – 2018

No comments :
Nav Durga, The nine forms of Goddess Durga.. Maa Shailputri, Maa Brahmacharini, Maa Chandraghanta, Maa Kushmanda, Maa Katyayani...
Chaitra Navratri puja vidhi -- चैत्र नवरात्रि में शरद नवरात्रि के हीतरह नौ दिनों तक माता के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना और उपवास कर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। हिन्दू पंचांग की गणना के अनुसार Navratri वर्ष में चार माह – चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ महीने की शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तक नौ दिन के होते हैं, नवरात्र शब्द, नव अहोरात्रों का बोध कराता है। नव मतलब शक्ति के नौ रूप । अहोरात्रों शब्द रात्रि और सिद्धि का प्रतीक है। शास्त्रों में उपासना और सिद्धियों के लिये दिन से अधिक रात्रियों को महत्त्व दिया जाता है।
महाराष्ट्र में Chaitra Navratri की शुरुआत गुड़ी पड़वा से और आन्ध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में उगादी से होती है।चैत्र शुक्ल पक्ष के नवरात्रों के साथ ही हिंदु नवसंवत्सर शुरू हो जाता हैं। जो की हिन्दु कैलेण्डर का पहला दिवस होता है। अतः भक्त लोग साल के प्रथम दिन से अगले नौ दिनों तक माता की पूजा कर वर्ष का शुभारम्भ करते हैं। भगवान राम का जन्मदिवस चैत्र नवरात्रि के अन्तिम दिन पड़ता है और इस कारण से चैत्र नवरात्रि को राम नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है।
Nav Durga - Free Maa Nav Durga HD wallpaper Download

Chaitra Navratri घट व कलश स्थापना शुभ मुहूर्त – 2018

घटस्थापना नवरात्रि के दौरान महत्वपूर्ण कर्मकाण्डों में से एक है। घटस्थापना का मुहूर्त, प्रतिपदा तिथि में दिन के पहले एक तिहाई भाग में, सबसे उपयुक्त होता है। कुछ कारणों की वजह से यदि मुहूर्त इस समय उपलब्ध नहीं है तो घटस्थापना अभिजीत मुहूर्त के दौरान की जा सकती है।
☆ घटस्थापना मुहूर्त -> प्रातः 6:31 से 07:46
☆ अवधि -> 1 घण्टा 15 मिनट्स
प्रतिपदा तिथि क्षय होने के कारण घटस्थापना मुहूर्त अमावस्या तिथि के दिन निर्धारित किया गया है।
प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ = 17/मार्च/2018 को संध्या 06:41 बजे
प्रतिपदा तिथि समाप्त = 18/मार्च/2017 को संध्या 06:31 बजे
Navratri, Durga Puja: Worshipping The Divine Mother - statue of Kushmanda, one of the nine forms of Shakti

Chaitra Navratri तिथि – 2018

18 मार्च: नवरात्र का पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना होती हैं। इस दिन घटस्थापना का मुहूर्त सुबहर 8:26 से लेकर 10:24 तक का हैं। पूजा में इन्हें चमेली का फूल अर्पित करना शुभ होता हैं।
19 मार्च : नवरात्र के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इनकी पूजा में भी चमेली का फूल अर्पित करना शुभ माना जाता हैं।
20 मार्च : नवरात्र के तीसरे दिन देवी चन्द्रघंटा की पूजा होती हैं। इन्हें भी चमेली का फूल पसंद हैं।
21 मार्च: नवऱात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे रूप देवी कूष्मांडा की पूजा होती हैं, जिन्हें लाल रंग के फूल पसंद हैं।
22 मार्च: नवरात्र के पांचवा दिन माता स्कंदमाता की पूजा की जाती है। जिन्हें मां पार्वती के नाम से भी जाना जाता हैं। इन्हें पूजा में लाल रंग के फूल अर्पित करने चाहिए।
23 मार्च: चैत्र नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा का होती हैं। जिन्हें लाल रंग के फूल खासकर गुलाब का फूल अर्पित करें।
24 मार्च: सातवें दिन यानि सप्तमी को मां कालरात्रि की पूजा होती हैं। जिन्हें रात की रानी का फूल पसंद हैं।
25 मार्च: नवरात्र के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। इस दिन कई लोग कन्या पूजन भी करते हैं।
26 मार्च: नववरात्र के अंतिम दिन राम नवमीं होती हैंं। पूजा का मुहूर्त सुबह 11: 09 ​से 1: 38 तक का हैं।
officialjusblaze:  Maa Durga . Parvati . Universal Mother

Chaitra Navratri कलश स्थापना के लिए सामग्री -2018

घट स्थापना के लिए मिट्टी ,सोना, चांदी, तांबा अथवा पीतल का कलश । याद रखे, लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग पूजा में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
☆ मिट्टी का पात्र, मिट्टी और जौ :- जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र और शुद्ध साफ की हुई मिट्टी जिसमे की जौ को बोया जा सके
☆ कलश में भरने के लिए शुद्ध जल अथवा अगर गंगाजल मिल जाये तो उत्तम होता है
☆ कलश ढकने के लिए ढक्कन
☆ पानी वाला नारियल और इसपर लपेटने के लिए लाल कपडा
☆ मोली (Sacred Thread) लाल सूत्र
☆ इत्र
☆ साबुत सुपारी
☆ दूर्वा
☆ कलश में रखने के लिए कुछ सिक्के
☆ पंचरत्न
☆ अशोक या आम के पत्ते
☆ ढक्कन में रखने के लिए बिना टूटे चावल
☆ फूल माला
Navratri SMS 2016-Top 10 Wishes Quotes-Durga Maa Images-NavDurga Photos-Whatsapp DP

Chaitra Navratri कलश स्थापना विधि

धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। हिन्दू धर्म में ऐशी धारणा है की कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं और कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं।
सबसे पहले पूजा स्थल को शुद्ध कर ले उसके ऊपर लाल रंग का कपड़ा बिछा ले । कपड़े पर थोड़ा चावल रख ले और गणेश जी का स्मरण करे । तत्पश्चात मिट्टी के पात्र में जौ बोना चाहिए । पात्र के उपर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करना चाहिए । कलश के मुख पर रक्षा सूत्र बांध ले और चारो तरफ कलश पर रोली से स्वस्तिक या ऊं बना ले । कलश के अंदर साबुत सुपारी, दूर्वा, फूल, सिक्का डालें । उसके ऊपर आम या अशोक के पत्ते रखने चाहिए उसके ऊपर नारियल, जिस पर लाल कपडा लपेट कर मोली लपेट दें। अब नारियल को कलश पर रखें। ध्यान रहे कि नारियल का मुख उस सिरे पर हो, जिस तरफ से वह पेड़ की टहनी से जुड़ा होता है । शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि नारियल का मुख नीचे की तरफ रखने से शत्रु में वृद्धि होती है । नारियल का मुख ऊपर की तरफ रखने से रोग बढ़ते हैं, जबकि पूर्व की तरफ नारियल का मुख रखने से धन का विनाश होता है। इसलिए नारियल की स्थापना सदैव इस प्रकार करनी चाहिए कि उसका मुख साधक की तरफ रहे।
अब कलश में सभी देवी देवताओं का आवाहन करें की नौ दिनों के लिए वह इस में विराजमान हो । अब दीपक जलाकर कलश का पूजन करें। धूपबत्ती कलश को दिखाएं। कलश को माला अर्पित करें। कलश को फल मिठाई इत्र वगैरा समर्पित करें।

Popular Posts